॥ श्रीहरिः ॥
मातृष्वसुरभिप्रायमिन्द्र आज्ञाय मानद।
शुश्रूषणेनाश्रमस्थां दितिं पर्यचरत्कविः४॥ ५६
mātṛṣvasurabhiprāyamindra ājñāya mānada|
śuśrūṣaṇenāśramasthāṃ ditiṃ paryacaratkaviḥ|| 56
अर्थ
प्रिय परीक्षित्! देवराज इन्द्र अपनी मौसी दितिका अभिप्राय जान बड़ी बुद्धिमानीसे अपना वेष बदलकर दितिके आश्रमपर आये और उसकी सेवा करने लगे॥ ५६॥
मातृष्वसुरभिप्रायमिन्द्र आज्ञाय मानद।
शुश्रूषणेनाश्रमस्थां दितिं पर्यचरत्कविः॥ ५६
प्रिय परीक्षित्! देवराज इन्द्र अपनी मौसी दितिका अभिप्राय जान बड़ी बुद्धिमानीसे अपना वेष बदलकर दितिके आश्रमपर आये और उसकी सेवा करने लगे॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 798) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/18/56/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—चरद्धरिः।
(मुद्रित पृष्ठ 798)