॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.18.57
नित्यं वनात्सुमनसः फलमूलसमित्कुशान्।
पत्राङ्कुरमृदोऽपश्च काले काल उपाहरत्॥ ५७
nityaṃ vanātsumanasaḥ phalamūlasamitkuśān|
patrāṅkuramṛdo'paśca kāle kāla upāharat|| 57
अर्थ
वे दितिके लिये प्रतिदिन समय-समयपर वनसे फूल-फल, कन्द-मूल, समिधा, कुश, पत्ते, दूब, मिट्टी और जल लाकर उसकी सेवामें समर्पित करते॥ ५७॥