श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.58

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

एवं तस्या व्रतस्थाया व्रतच्छिद्रं हरिर्नृप।

प्रेप्सुः पर्यचरज्जिह्मो मृगहेव मृगाकृतिः॥ ५८

evaṃ tasyā vratasthāyā vratacchidraṃ harirnṛpa|

prepsuḥ paryacarajjihmo mṛgaheva mṛgākṛtiḥ|| 58

अर्थ

राजन्! जिस प्रकार बहेलिया हरिनको मारनेके लिये हरिनकी-सी सूरत बनाकर उसके पास जाता है, वैसे ही देवराज इन्द्र भी कपटवेष धारण करके व्रतपरायणा दितिके व्रतपालनकी त्रुटि पकड़नेके लिये उसकी सेवा करने लगे॥ ५८॥

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