भगवान्की पूजाके बाद अपने पतिको साक्षात् भगवान् समझकर परम प्रेमसे उनकी प्रिय वस्तुएँ सेवामें उपस्थित करे। पतिका भी यह कर्तव्य है कि वह आन्तरिक प्रेमसे अपनी पत्नीके प्रिय पदार्थ ला-लाकर उसे दे और उसके छोटे-बड़े सब प्रकारके काम करता रहे॥ १७॥✎ 5585595605611614
पतिं च परया भक्त्या महापुरुषचेतसा।
प्रियैस्तैस्तैरुपनमेत् प्रेमशीलः स्वयं पतिः।
बिभृयात् सर्वकर्माणि पत्न्या उच्चावचानि च॥ १७
भगवान्की पूजाके बाद अपने पतिको साक्षात् भगवान् समझकर परम प्रेमसे उनकी प्रिय वस्तुएँ सेवामें उपस्थित करे। पतिका भी यह कर्तव्य है कि वह आन्तरिक प्रेमसे अपनी पत्नीके प्रिय पदार्थ ला-लाकर उसे दे और उसके छोटे-बड़े सब प्रकारके काम करता रहे॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.19.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 803) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)