॥ श्रीहरिः ॥
श्वोभूतेऽप उपस्पृश्य कृष्णमभ्यर्च्य पूर्ववत्।
पयःशृतेन जुहुयाच्चरुणा सह सर्पिषा।
पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुतीः पतिः॥ २२
śvobhūte'pa upaspṛśya kṛṣṇamabhyarcya pūrvavat|
payaḥśṛtena juhuyāccaruṇā saha sarpiṣā|
pākayajñavidhānena dvādaśaivāhutīḥ patiḥ|| 22
अर्थ
उस दिन प्रातःकाल ही स्नान करके पूर्ववत् विष्णुभगवान्का पूजन करे और उसका पति पाकयज्ञकी विधिसे घृतमिश्रित खीरकी अग्निमें बारह आहुति दे॥ २२॥
श्वोभूतेऽप उपस्पृश्य कृष्णमभ्यर्च्य पूर्ववत्।
पयःशृतेन जुहुयाच्चरुणा सह सर्पिषा।
पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुतीः पतिः॥ २२
उस दिन प्रातःकाल ही स्नान करके पूर्ववत् विष्णुभगवान्का पूजन करे और उसका पति पाकयज्ञकी विधिसे घृतमिश्रित खीरकी अग्निमें बारह आहुति दे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.19.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 803) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/22/