श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.32

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अथापि मे दुर्भगस्य विबुधोत्तमदर्शने।

भवितव्यं मङ्गलेन येनात्मा मे प्रसीदति॥ ३२

athāpi me durbhagasya vibudhottamadarśane|

bhavitavyaṃ maṅgalena yenātmā me prasīdati|| 32

अर्थ

यद्यपि मैं इस जन्मका महापापी हूँ, फिर भी मैंने पूर्वजन्मोंमें अवश्य ही शुभकर्म किये होंगे; तभी तो मुझे इन श्रेष्ठ देवताओंके दर्शन हुए। उनकी स्मृतिसे मेरा हृदय अब भी आनन्दसे भर रहा है॥ ३२॥

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