श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.33

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अन्यथा म्रियमाणस्य नाशुचेर्वृषलीपतेः।

वैकुण्ठनामग्रहणं जिह्वा वक्तुमिहार्हति॥ ३३

anyathā mriyamāṇasya nāśucervṛṣalīpateḥ|

vaikuṇṭhanāmagrahaṇaṃ jihvā vaktumihārhati|| 33

अर्थ

मैं कुलटागामी और अत्यन्त अपवित्र हूँ। यदि पूर्वजन्ममें मैंने पुण्य न किये होते, तो मरनेके समय मेरी जीभ भगवान्‌के मनोमोहक नामका उच्चारण कैसे कर पाती?॥ ३३॥✎ 498

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #498 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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