कहाँ तो मैं महाकपटी, पापी, निर्लज्ज और ब्रह्मतेजको नष्ट करनेवाला तथा कहाँ भगवान्का वह परम मंगलमय ‘नारायण’ नाम! (सचमुच मैं तो कृतार्थ हो गया)॥ ३४॥✎ 498
क्व चाहं कितवः पापो ब्रह्मघ्नो निरपत्रपः।
क्व च नारायणेत्येतद्भगवन्नाम मङ्गलम्॥ ३४
कहाँ तो मैं महाकपटी, पापी, निर्लज्ज और ब्रह्मतेजको नष्ट करनेवाला तथा कहाँ भगवान्का वह परम मंगलमय ‘नारायण’ नाम! (सचमुच मैं तो कृतार्थ हो गया)॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 710) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/2/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)