dhāsye mano bhagavati śuddhaṃ tatkīrtanādibhiḥ|| 38
अर्थ
मैंने सत्य वस्तु परमात्माको पहचान लिया है; अतः अब मैं शरीर आदिमें ‘मैं’ तथा ‘मेरे’ का भाव छोड़कर भगवन्नामके कीर्तन आदिसे अपने मनको शुद्ध करूँगा और उसे भगवान्में लगाऊँगा॥ ३८॥✎ 499
ममाहमिति देहादौ हित्वामिथ्यार्थधीर्मतिम्।
धास्ये मनो भगवति शुद्धं तत्कीर्तनादिभिः॥ ३८
मैंने सत्य वस्तु परमात्माको पहचान लिया है; अतः अब मैं शरीर आदिमें ‘मैं’ तथा ‘मेरे’ का भाव छोड़कर भगवन्नामके कीर्तन आदिसे अपने मनको शुद्ध करूँगा और उसे भगवान्में लगाऊँगा॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 710) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/2/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#499 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में