श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.39

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति जातसुनिर्वेदः क्षणसङ्गेन साधुषु।

गङ्गाद्वारमुपेयाय मुक्तसर्वानुबन्धनः॥ ३९

iti jātasunirvedaḥ kṣaṇasaṅgena sādhuṣu|

gaṅgādvāramupeyāya muktasarvānubandhanaḥ|| 39

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! उन भगवान्‌के पार्षद महात्माओंका केवल थोड़ी ही देरके लिये सत्संग हुआ था। इतनेसे ही अजामिलके चित्तमें संसारके प्रति तीव्र वैराग्य हो गया। वे सबके सम्बन्ध और मोहको छोड़कर हरद्वार चले गये॥ ३९॥

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