॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.2.42
यर्ह्युपारतधीस्तस्मिन्नद्राक्षीत्पुरुषान् पुरः।
उपलभ्योपलब्धान् प्राग्ववन्दे शिरसा द्विजः॥ ४२
yarhyupāratadhīstasminnadrākṣītpuruṣān puraḥ|
upalabhyopalabdhān prāgvavande śirasā dvijaḥ|| 42
अर्थ
इस प्रकार जब अजामिलकी बुद्धि त्रिगुणमयी प्रकृतिसे ऊपर उठकर भगवान्के स्वरूपमें स्थित हो गयी, तब उन्होंने देखा कि उनके सामने वे ही चारों पार्षद, जिन्हें उन्होंने पहले देखा था, खड़े हैं। अजामिलने सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया॥ ४२॥