वर्षाकालीन मेघके समान श्यामल शरीरपर पीताम्बर फहरा रहा था। मुखमण्डल प्रफुल्लित था। नेत्रोंसे प्रसादकी वर्षा हो रही थी। घुटनोंतक वनमाला लटक रही थी। वक्षःस्थलपर सुनहरी रेखा—श्रीवत्सचिह्न और गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही थी॥ ३७॥✎ 511
पीतवासा घनश्यामः प्रसन्नवदनेक्षणः।
वनमालानिवीताङ्गो लसच्छ्रीवत्सकौस्तुभः॥ ३७
वर्षाकालीन मेघके समान श्यामल शरीरपर पीताम्बर फहरा रहा था। मुखमण्डल प्रफुल्लित था। नेत्रोंसे प्रसादकी वर्षा हो रही थी। घुटनोंतक वनमाला लटक रही थी। वक्षःस्थलपर सुनहरी रेखा—श्रीवत्सचिह्न और गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही थी॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.4.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 722) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/4/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)