श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.37

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

पीतवासा घनश्यामः प्रसन्‍नवदनेक्षणः।

वनमालानिवीताङ्गो लसच्छ्रीवत्सकौस्तुभः॥ ३७

pītavāsā ghanaśyāmaḥ prasannavadanekṣaṇaḥ|

vanamālānivītāṅgo lasacchrīvatsakaustubhaḥ|| 37

अर्थ

वर्षाकालीन मेघके समान श्यामल शरीरपर पीताम्बर फहरा रहा था। मुखमण्डल प्रफुल्लित था। नेत्रोंसे प्रसादकी वर्षा हो रही थी। घुटनोंतक वनमाला लटक रही थी। वक्षःस्थलपर सुनहरी रेखा—श्रीवत्सचिह्न और गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही थी॥ ३७॥✎ 511

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #511 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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