श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.47

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः।

संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्‍वतः॥ ४७

ahamevāsamevāgre nānyat kiñcāntaraṃ bahiḥ|

saṃjñānamātramavyaktaṃ prasuptamiva viśvataḥ|| 47

अर्थ

जब यह सृष्टि नहीं थी, तब केवल मैं ही था और वह भी निष्क्रियरूपमें। बाहर-भीतर कहीं भी और कुछ न था। न तो कोई द्रष्टा था और न दृश्य। मैं केवल ज्ञानस्वरूप और अव्यक्त था। ऐसा समझ लो, मानो सब ओर सुषुप्ति-ही-सुषुप्ति छा रही हो॥ ४७॥✎ 512

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #512 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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