श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.48

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतो गुणविग्रहः।

यदाऽऽसीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः॥ ४८

mayyanantaguṇe'nante guṇato guṇavigrahaḥ|

yadā''sīt tata evādyaḥ svayambhūḥ samabhūdajaḥ|| 48

अर्थ

प्रिय दक्ष! मैं अनन्त गुणोंका आधार एवं स्वयं अनन्त हूँ। जब गुणमयी मायाके क्षोभसे यह ब्रह्माण्ड-शरीर प्रकट हुआ, तब इसमें अयोनिज आदिपुरुष ब्रह्मा उत्पन्‍न हुए॥ ४८॥✎ 512

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #512 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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