परीक्षित्! इस प्रकार दक्षके पुत्र शबलाश्व प्रजासृष्टिके लिये तपस्यामें संलग्न थे। उनके पास भी देवर्षि नारद आये और उन्होंने पहलेके समान ही कूट वचन कहे॥ २९॥
इति तानपि राजेन्द्र प्रतिसर्गधियो मुनिः।
उपेत्य नारदः प्राह वाचःकूटानि पूर्ववत्॥ २९
परीक्षित्! इस प्रकार दक्षके पुत्र शबलाश्व प्रजासृष्टिके लिये तपस्यामें संलग्न थे। उनके पास भी देवर्षि नारद आये और उन्होंने पहलेके समान ही कूट वचन कहे॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 728) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/5/29/