उन्होंने कहा—‘दक्षप्रजापतिके पुत्रो! मैं तुमलोगोंको जो उपदेश देता हूँ, उसे सुनो। तुमलोग तो अपने भाइयोंसे बड़ा प्रेम करते हो। इसलिये उनके मार्गका अनुसन्धान करो॥ ३०॥
दाक्षायणाः संशृणुत गदतो निगमं मम।
अन्विच्छतानुपदवीं भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलाः॥ ३०
उन्होंने कहा—‘दक्षप्रजापतिके पुत्रो! मैं तुमलोगोंको जो उपदेश देता हूँ, उसे सुनो। तुमलोग तो अपने भाइयोंसे बड़ा प्रेम करते हो। इसलिये उनके मार्गका अनुसन्धान करो॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 728) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/5/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1075 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भ्रातृणां → भ्रातॄणां