श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.37

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ऋणैस्त्रिभिरमुक्तानाममीमांसितकर्मणाम् ।

विघातः श्रेयसः पाप लोकयोरुभयोः कृतः॥ ३७

ṛṇaistribhiramuktānāmamīmāṃsitakarmaṇām |

vighātaḥ śreyasaḥ pāpa lokayorubhayoḥ kṛtaḥ|| 37

अर्थ

अभी उन्होंने ब्रह्मचर्यसे ऋषि-ऋण, यज्ञसे देव-ऋण और पुत्रोत्पत्तिसे पितृ-ऋण नहीं उतारा था। उन्हें अभी कर्मफलकी नश्‍वरताके सम्बन्धमें भी कुछ विचार नहीं था। परन्तु पापात्मन्! तुमने उनके दोनों लोकोंका सुख चौपट कर दिया॥ ३७॥

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