श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.40

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नेत्थं पुंसां विरागः स्यात् त्वया केवलिना मृषा।

मन्यसे यद्युपशमं स्नेहपाशनिकृन्तनम्॥ ४०

netthaṃ puṃsāṃ virāgaḥ syāt tvayā kevalinā mṛṣā|

manyase yadyupaśamaṃ snehapāśanikṛntanam|| 40

अर्थ

यदि तुम ऐसा समझते हो कि वैराग्यसे ही स्नेहपाश—विषयासक्तिका बन्धन कट सकता है, तो तुम्हारा यह विचार ठीक नहीं है; क्योंकि तुम्हारे जैसे झूठमूठ वैराग्यका स्वाँग भरनेवालोंसे किसीको वैराग्य नहीं हो सकता॥ ४०॥

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