श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.42

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यन्‍नस्त्वं कर्मसन्धानां साधूनां गृहमेधिनाम्।

कृतवानसि दुर्मर्षं विप्रियं तव मर्षितम्॥ ४२

yannastvaṃ karmasandhānāṃ sādhūnāṃ gṛhamedhinām|

kṛtavānasi durmarṣaṃ vipriyaṃ tava marṣitam|| 42

अर्थ

हमलोग सद‍्गृहस्थ हैं, अपनी धर्ममर्यादाका पालन करते हैं। एक बार पहले भी तुमने हमारा असह्य अपकार किया था। तब हमने उसे सह लिया॥ ४२॥

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