श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.43

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तन्तुकृन्तन यन्‍नस्त्वमभद्रमचरः पुनः।

तस्माल्लोकेषु ते मूढ न भवेद् भ्रमतः पदम्॥ ४३

tantukṛntana yannastvamabhadramacaraḥ punaḥ|

tasmāllokeṣu te mūḍha na bhaved bhramataḥ padam|| 43

अर्थ

तुम तो हमारी वंशपरम्पराका उच्छेद करनेपर ही उतारू हो रहे हो। तुमने फिर हमारे साथ वही दुष्टताका व्यवहार किया। इसलिये मूढ़! जाओ, लोक-लोकान्तरोंमें भटकते रहो। कहीं भी तुम्हारे लिये ठहरनेको ठौर नहीं होगी॥ ४३॥

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