श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.8.27

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यन्‍नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।

सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा॥ २७

yanno bhayaṃ grahebhyo'bhūt ketubhyo nṛbhya eva ca|

sarīsṛpebhyo daṃṣṭribhyo bhūtebhyoṃ'hobhya eva vā|| 27

अर्थ

सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छलतारे) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगनेवाले जन्तु, दाढ़ोंवाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियोंसे हमें जो-जो भय हों और जो-जो हमारे मंगलके विरोधी हों—वे सभी भगवान्‌के नाम, रूप तथा आयुधोंका कीर्तन करनेसे तत्काल नष्ट हो जायँ॥ २७-२८॥✎ 1912

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1912 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): प्रकरकी → प्रकारकी

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