॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.9.37
समविषममतीनां मतमनुसरसि यथा रज्जुखण्डः सर्पादिधियाम्॥ ३७॥
samaviṣamamatīnāṃ matamanusarasi yathā rajjukhaṇḍaḥ sarpādidhiyām|| 37||
अर्थ
जैसे एक ही रस्सीका टुकड़ा भ्रान्त पुरुषोंको सर्प, माला, धारा आदिके रूपमें प्रतीत होता है, किन्तु जानकारको रस्सीके रूपमें—वैसे ही आप भी भ्रान्तबुद्धिवालोंको कर्ता, भोक्ता आदि अनेक रूपोंमें दीखते हैं और ज्ञानीको शुद्ध सच्चिदानन्दके रूपमें। आप सभीकी बुद्धिका अनुसरण करते हैं॥ ३७॥