श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.38

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स एव हि पुनः सर्ववस्तुनि वस्तुस्वरूपः सर्वेश्‍वरः सकलजगत‍्कारणकारणभूतः सर्वप्रत्यगात्मत्वात् सर्वगुणाभासोपलक्षित एक एव पर्यवशेषितः॥ ३८॥

sa eva hi punaḥ sarvavastuni vastusvarūpaḥ sarveśvaraḥ sakalajagatkāraṇakāraṇabhūtaḥ sarvapratyagātmatvāt sarvaguṇābhāsopalakṣita eka eva paryavaśeṣitaḥ|| 38||

अर्थ

विचारपूर्वक देखनेसे मालूम होता है कि आप ही समस्त वस्तुओंमें वस्तुत्वके रूपसे विराजमान हैं, सबके स्वामी हैं और सम्पूर्ण जगत‍्के कारण ब्रह्मा, प्रकृति आदिके भी कारण हैं। आप सबके अन्तर्यामी अन्तरात्मा हैं; इसलिये जगत‍्में जितने भी गुण-दोष प्रतीत हो रहे हैं, उन सबकी प्रतीतियाँ अपने अधिष्ठानस्वरूप आपका ही संकेत करती हैं और श्रुतियोंने समस्त पदार्थोंका निषेध करके अन्तमें निषेधकी अवधिके रूपमें केवल आपको ही शेष रखा है॥ ३८॥

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