श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.15

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

युधिष्ठिर उवाच

अहो अत्यद्भुतं ह्येतद्दुर्लभैकान्तिनामपि।

वासुदेवे परे तत्त्वे प्राप्तिश्चैद्यस्य विद्विषः॥ १५

aho atyadbhutaṃ hyetaddurlabhaikāntināmapi|

vāsudeve pare tattve prāptiścaidyasya vidviṣaḥ|| 15

अर्थ

युधिष्ठिरने पूछा—अहो! यह तो बड़ी विचित्र बात है। परमतत्त्व भगवान् श्रीकृष्णमें समा जाना तो बड़े-बड़े अनन्य भक्तोंके लिये भी दुर्लभ है; फिर भगवान्‌से द्वेष करनेवाले शिशुपालको यह गति कैसे मिली?॥ १५॥✎ 564 565 566 567

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #564 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #565 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #566 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #567 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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