वासुदेवे परे तत्त्वे प्राप्तिश्चैद्यस्य विद्विषः॥ १५
aho atyadbhutaṃ hyetaddurlabhaikāntināmapi|
vāsudeve pare tattve prāptiścaidyasya vidviṣaḥ|| 15
अर्थ
युधिष्ठिरने पूछा—अहो! यह तो बड़ी विचित्र बात है। परमतत्त्व भगवान् श्रीकृष्णमें समा जाना तो बड़े-बड़े अनन्य भक्तोंके लिये भी दुर्लभ है; फिर भगवान्से द्वेष करनेवाले शिशुपालको यह गति कैसे मिली?॥ १५॥✎ 564565566567
अहो अत्यद्भुतं ह्येतद्दुर्लभैकान्तिनामपि।
वासुदेवे परे तत्त्वे प्राप्तिश्चैद्यस्य विद्विषः॥ १५
युधिष्ठिरने पूछा—अहो! यह तो बड़ी विचित्र बात है। परमतत्त्व भगवान् श्रीकृष्णमें समा जाना तो बड़े-बड़े अनन्य भक्तोंके लिये भी दुर्लभ है; फिर भगवान्से द्वेष करनेवाले शिशुपालको यह गति कैसे मिली?॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 807) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/1/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)