श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.25

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तस्माद्वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा।

स्नेहात्कामेन वा युञ्ज्यात् कथञ्चिन्‍नेक्षते पृथक्॥ २५

tasmādvairānubandhena nirvaireṇa bhayena vā|

snehātkāmena vā yuñjyāt kathañcinnekṣate pṛthak|| 25

अर्थ

इसलिये चाहे सुदृढ़ वैरभावसे या वैरहीन भक्तिभावसे, भयसे, स्नेहसे अथवा कामनासे—कैसे भी हो, भगवान्‌में अपना मन पूर्णरूपसे लगा देना चाहिये। भगवान्‌की दृष्टिसे इन भावोंमें कोई भेद नहीं है॥ २५॥✎ 568 569 570

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #568 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #569 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #570 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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