युधिष्ठिर! मेरा तो ऐसा दृढ़ निश्चय है कि मनुष्य वैरभावसे भगवान्में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोगसे नहीं होता॥ २६॥✎ 571572573574575576
यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात्।
न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः॥ २६
युधिष्ठिर! मेरा तो ऐसा दृढ़ निश्चय है कि मनुष्य वैरभावसे भगवान्में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोगसे नहीं होता॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 808) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/1/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
#571 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में
#572 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में