भृंगी कीड़ेको लाकर भीतपर अपने छिद्रमें बंद कर देता है और वह भय तथा उद्वेगसे भृंगीका चिन्तन करते-करते उसके-जैसा ही हो जाता है॥ २७॥✎ 571572573574575576
कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्यायां तमनुस्मरन्।
संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम्॥ २७
भृंगी कीड़ेको लाकर भीतपर अपने छिद्रमें बंद कर देता है और वह भय तथा उद्वेगसे भृंगीका चिन्तन करते-करते उसके-जैसा ही हो जाता है॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 808) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/1/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
#571 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में
#572 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में