श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.29

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

कामाद् द्वेषाद्भयात्स्नेहाद्यथा भक्त्येश्‍वरे मनः।

आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः॥ २९

kāmād dveṣādbhayātsnehādyathā bhaktyeśvare manaḥ|

āveśya tadaghaṃ hitvā bahavastadgatiṃ gatāḥ|| 29

अर्थ

एक नहीं, अनेकों मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्‌में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर उसी प्रकार भगवान्‌को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे॥ २९॥✎ 571 572 573 574 575 576

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #571 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #572 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #573 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #574 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #575 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #576 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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