श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.30

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

गोप्यः कामाद्भयात्कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः।

सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद्यूयं भक्‍त्या वयं विभो॥ ३०

gopyaḥ kāmādbhayātkaṃso dveṣāccaidyādayo nṛpāḥ|

sambandhād vṛṣṇayaḥ snehādyūyaṃ bhaktyā vayaṃ vibho|| 30

अर्थ

महाराज! गोपियोंने भगवान्‌से मिलनके तीव्र काम अर्थात् प्रेमसे, कंसने भयसे, शिशुपाल-दन्तवक्‍त्र आदि राजाओंने द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवारके सम्बन्धसे, तुमलोगोंने स्नेहसे और हमलोगोंने भक्तिसे अपने मनको भगवान्‌में लगाया है॥ ३०॥✎ 571 572 573 574 575 576

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #571 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #572 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #573 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #574 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #575 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #576 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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