श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.46

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसात्मताम्।

नीतौ पुनर्हरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ॥ ४६

vairānubandhatīvreṇa dhyānenācyutasātmatām|

nītau punarhareḥ pārśvaṃ jagmaturviṣṇupārṣadau|| 46

अर्थ

वैरभावके कारण निरन्तर ही वे भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन किया करते थे। उसी तीव्र तन्मयताके फलस्वरूप वे भगवान्‌को प्राप्त हो गये और पुनः उनके पार्षद होकर उन्हींके समीप चले गये॥ ४६॥✎ 579

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #579 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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