वैरभावके कारण निरन्तर ही वे भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन किया करते थे। उसी तीव्र तन्मयताके फलस्वरूप वे भगवान्को प्राप्त हो गये और पुनः उनके पार्षद होकर उन्हींके समीप चले गये॥ ४६॥✎ 579
वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसात्मताम्।
नीतौ पुनर्हरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ॥ ४६
वैरभावके कारण निरन्तर ही वे भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन किया करते थे। उसी तीव्र तन्मयताके फलस्वरूप वे भगवान्को प्राप्त हो गये और पुनः उनके पार्षद होकर उन्हींके समीप चले गये॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 810) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/1/46/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)