श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.47

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

युधिष्ठिर उवाच

विद्वेषो दयिते पुत्रे कथमासीन्महात्मनि।

ब्रूहि मे भगवन्येन प्रह्रादस्याच्युतात्मता॥ ४७

vidveṣo dayite putre kathamāsīnmahātmani|

brūhi me bhagavanyena prahrādasyācyutātmatā|| 47

अर्थ

युधिष्ठिरजीने पूछा—भगवन्! हिरण्यकशिपुने अपने स्नेहभाजन पुत्र प्रह्लादसे इतना द्वेष क्यों किया? फिर प्रह्लाद तो महात्मा थे। साथ ही यह भी बतलाइये कि किस साधनसे प्रह्लाद भगवन्मय हो गये॥ ४७॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे
प्रह्रादचरितोपक्रमे प्रथमोऽध्यायः
॥ १॥

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