दैत्यराज! मेरे भक्तिभावसे जिनकी कामनाएँ नष्ट हो गयी हैं, वे सर्वत्र आत्मभाव हो जानेके कारण छोटे-बड़े किसी भी प्राणीको किसी भी प्रकारसे कष्ट नहीं पहुँचाते॥ २०॥✎ 6262024
सर्वात्मना न हिंसन्ति भूतग्रामेषु किञ्चन।
उच्चावचेषु दैत्येन्द्र मद्भावेन गतस्पृहाः॥ २०
दैत्यराज! मेरे भक्तिभावसे जिनकी कामनाएँ नष्ट हो गयी हैं, वे सर्वत्र आत्मभाव हो जानेके कारण छोटे-बड़े किसी भी प्राणीको किसी भी प्रकारसे कष्ट नहीं पहुँचाते॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 869) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#626 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्ने