श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.63

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन्विमोहिताः।

तद् विज्ञाय महायोगी रसपालानिदं जगौ॥ ६३

te'surā hyapi paśyanto na nyaṣedhanvimohitāḥ|

tad vijñāya mahāyogī rasapālānidaṃ jagau|| 63

अर्थ

यद्यपि उसके रक्षक दैत्य इन दोनोंको देख रहे थे, फिर भी भगवान्‌की मायासे वे इतने मोहित हो गये कि इन्हें रोक न सके। जब उपाय जाननेवालोंमें श्रेष्ठ मयासुरको यह बात मालूम हुई, तब भगवान्‌की इस लीलाका स्मरण करके उसे कोई शोक न हुआ। शोक करनेवाले अमृत-रक्षकोंसे उसने कहा—‘भाई! देवता, असुर, मनुष्य अथवा और कोई भी प्राणी अपने, पराये अथवा दोनोंके लिये जो प्रारब्धका विधान है, उसे मिटा नहीं सकता। जो होना था, हो गया। शोक करके क्या करना है?’ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपनी शक्तियोंके द्वारा भगवान् शंकरके युद्धकी सामग्री तैयार की॥ ६३—६५॥✎ 633 634

यह अर्थ श्लोक 63–65 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #633 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #634 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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