श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.12

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

नृणामयं परो धर्मः सर्वेषां समुदाहृतः।

त्रिंशल्लक्षणवान्राजन्सर्वात्मा येन तुष्यति॥ १२

nṛṇāmayaṃ paro dharmaḥ sarveṣāṃ samudāhṛtaḥ|

triṃśallakṣaṇavānrājansarvātmā yena tuṣyati|| 12

अर्थ

युधिष्ठिर! धर्मके ये तीस लक्षण शास्त्रोंमें कहे गये हैं—सत्य, दया, तपस्या, शौच, तितिक्षा, उचित-अनुचितका विचार, मनका संयम, इन्द्रियोंका संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, सन्तोष, समदर्शी महात्माओंकी सेवा, धीरे-धीरे सांसारिक भोगोंकी चेष्टासे निवृत्ति, मनुष्यके अभिमानपूर्ण प्रयत्नोंका फल उलटा ही होता है—ऐसा विचार, मौन, आत्मचिन्तन, प्राणियोंको अन्‍न आदिका यथायोग्य विभाजन, उनमें और विशेष करके मनुष्योंमें अपने आत्मा तथा इष्टदेवका भाव, संतोंके परम आश्रय भगवान् श्रीकृष्णके नाम-गुण-लीला आदिका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, उनकी सेवा, पूजा और नमस्कार; उनके प्रति दास्य, सख्य और आत्मसमर्पण—यह तीस प्रकारका आचरण सभी मनुष्योंका परम धर्म है। इसके पालनसे सर्वात्मा भगवान् प्रसन्‍न होते हैं॥ ८—१२॥

यह अर्थ श्लोक 8–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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