श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.13

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

संस्कारा यदविच्छिन्‍नाः स द्विजोऽजो जगाद यम्।

इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम्।

जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्चाश्रमचोदिताः॥ १३

saṃskārā yadavicchinnāḥ sa dvijo'jo jagāda yam|

ijyādhyayanadānāni vihitāni dvijanmanām|

janmakarmāvadātānāṃ kriyāścāśramacoditāḥ|| 13

अर्थ

धर्मराज! जिनके वंशमें अखण्डरूपसे संस्कार होते आये हैं और जिन्हें ब्रह्माजीने संस्कारके योग्य स्वीकार किया है, उन्हें द्विज कहते हैं। जन्म और कर्मसे शुद्ध द्विजोंके लिये यज्ञ, अध्ययन, दान और ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंके विशेष कर्मोंका विधान है॥ १३॥

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