श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.31

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

प्रायः स्वभावविहितो नृणां धर्मो युगे युगे।

वेददृग्भिः स्मृतो राजन्प्रेत्य चेह च शर्मकृत्॥ ३१

prāyaḥ svabhāvavihito nṛṇāṃ dharmo yuge yuge|

vedadṛgbhiḥ smṛto rājanpretya ceha ca śarmakṛt|| 31

अर्थ

वेददर्शी ऋषि-मुनियोंने युग-युगमें प्रायः मनुष्योंके स्वभावके अनुसार धर्मकी व्यवस्था की है। वही धर्म उनके लिये इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी है॥ ३१॥

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