जो स्वाभाविक वृत्तिका आश्रय लेकर अपने स्वधर्मका पालन करता है, वह धीरे-धीरे उन स्वाभाविक कर्मोंसे भी ऊपर उठ जाता है और गुणातीत हो जाता है॥ ३२॥
वृत्त्या स्वभावकृतया वर्तमानः स्वकर्मकृत्।
हित्वा स्वभावजं कर्म शनैर्निर्गुणतामियात्॥ ३२
जो स्वाभाविक वृत्तिका आश्रय लेकर अपने स्वधर्मका पालन करता है, वह धीरे-धीरे उन स्वाभाविक कर्मोंसे भी ऊपर उठ जाता है और गुणातीत हो जाता है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.11.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 878) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/11/32/