श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.12.6

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सुशीलो मितभुग् दक्षः श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।

यावदर्थं व्यवहरेत् स्त्रीषु स्त्रीनिर्जितेषु च॥ ६

suśīlo mitabhug dakṣaḥ śraddadhāno jitendriyaḥ|

yāvadarthaṃ vyavaharet strīṣu strīnirjiteṣu ca|| 6

अर्थ

अपने शीलकी रक्षा करे। थोड़ा खाये। अपने कामोंको निपुणताके साथ करे। श्रद्धा रखे और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखे। स्त्री और स्त्रियोंके वशमें रहनेवालोंके साथ जितनी आवश्यकता हो, उतना ही व्यवहार करे॥ ६॥

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