श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.34

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

मधुकारमहासर्पौ लोकेऽस्मिन्‍नो गुरूत्तमौ।

वैराग्यं परितोषं च प्राप्ता यच्छिक्षया वयम्॥ ३४

madhukāramahāsarpau loke'sminno gurūttamau|

vairāgyaṃ paritoṣaṃ ca prāptā yacchikṣayā vayam|| 34

अर्थ

इस लोकमें मेरे सबसे बड़े गुरु हैं—अजगर और मधुमक्खी। उनकी शिक्षासे हमें वैराग्य और सन्तोषकी प्राप्ति हुई है॥ ३४॥

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