श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.33

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

शोकमोहभयक्रोधरागक्लैब्यश्रमादयः ।

यन्मूलाः स्युर्नृणां जह्यात् स्पृहां१ प्राणार्थयोर्बुधः॥ ३३

śokamohabhayakrodharāgaklaibyaśramādayaḥ |

yanmūlāḥ syurnṛṇāṃ jahyāt spṛhāṃ prāṇārthayorbudhaḥ|| 33

अर्थ

इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जिसके कारण शोक, मोह, भय, क्रोध, राग, कायरता और श्रम आदिका शिकार होना पड़ता है—उस धन और जीवनकी स्पृहाका त्याग कर दे॥ ३३॥✎ 1979

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—स्पृहाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 887)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1979 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अपने-आप → अपने-आपसे

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