शिष्य-मण्डली न जुटावे, बहुत-से ग्रन्थोंका अभ्यास न करे, व्याख्यान न दे और बड़े-बड़े कामोंका आरम्भ न करे॥ ८॥
न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान्नैवाभ्यसेद् बहून्।
न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत् क्वचित्॥ ८
शिष्य-मण्डली न जुटावे, बहुत-से ग्रन्थोंका अभ्यास न करे, व्याख्यान न दे और बड़े-बड़े कामोंका आरम्भ न करे॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 884) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/13/8/