॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.14.25
एषु स्नानं जपो होमो व्रतं देवद्विजार्चनम्।
पितृदेवनृभूतेभ्यो यद् दत्तं तद्ध्यनश्वरम्॥ २५
eṣu snānaṃ japo homo vrataṃ devadvijārcanam|
pitṛdevanṛbhūtebhyo yad dattaṃ taddhyanaśvaram|| 25
अर्थ
इन शुभ संयोगोंमें जो स्नान, जप, होम, व्रत तथा देवता और ब्राह्मणोंकी पूजा की जाती है अथवा जो कुछ देवता, पितर, मनुष्य एवं प्राणियोंको समर्पित किया जाता है, उसका फल अक्षय होता है॥ २५॥✎ 639