sa vai puṇyatamo deśaḥ satpātraṃ yatra labhyate|| 27
अर्थ
युधिष्ठिर! अब मैं उन स्थानोंका वर्णन करता हूँ, जो धर्म आदि श्रेयकी प्राप्ति करानेवाले हैं। सबसे पवित्र देश वह है, जिसमें सत्पात्र मिलते हों॥ २७॥
अथ देशान्प्रवक्ष्यामि धर्मादिश्रेयआवहान्।
स वै पुण्यतमो देशः सत्पात्रं यत्र लभ्यते॥ २७
युधिष्ठिर! अब मैं उन स्थानोंका वर्णन करता हूँ, जो धर्म आदि श्रेयकी प्राप्ति करानेवाले हैं। सबसे पवित्र देश वह है, जिसमें सत्पात्र मिलते हों॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.14.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 892) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/14/27/