श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.24

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

कृपया भूतजं दुःखं दैवं जह्यात् समाधिना।

आत्मजं योगवीर्येण निद्रां सत्त्वनिषेवया॥ २४

kṛpayā bhūtajaṃ duḥkhaṃ daivaṃ jahyāt samādhinā|

ātmajaṃ yogavīryeṇa nidrāṃ sattvaniṣevayā|| 24

अर्थ

आधिभौतिक दुःखको दयाके द्वारा, आधिदैविक वेदनाको समाधिके द्वारा और आध्यात्मिक दुःखको योगबलसे एवं निद्राको सात्त्विक भोजन, स्थान, संग आदिके सेवनसे जीत लेना चाहिये॥ २४॥

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