॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.15.53
इन्द्रियाणि मनस्यूर्मौ वाचि वैकारिकं मनः।
वाचं वर्णसमाम्नाये तमोङ्कारे स्वरे न्यसेत्।
ओङ्कारं बिन्दौ नादे तं तं तु प्राणे महत्यमुम्॥ ५३
indriyāṇi manasyūrmau vāci vaikārikaṃ manaḥ|
vācaṃ varṇasamāmnāye tamoṅkāre svare nyaset|
oṅkāraṃ bindau nāde taṃ taṃ tu prāṇe mahatyamum|| 53
अर्थ
इन्द्रियोंको दर्शनादि-संकल्परूप मनमें, वैकारिक मनको परा वाणीमें और परा वाणीको वर्णसमुदायमें, वर्णसमुदायको ‘अ उ म्’ इन तीन स्वरोंके रूपमें रहनेवाले ॐ कारमें, ॐ कारको बिन्दुमें, बिन्दुको नादमें, नादको सूत्रात्मारूप प्राणमें तथा प्राणको ब्रह्ममें लीन कर देता है॥ ५३॥✎ 1620