श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.61

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

स्यात् सादृश्यभ्रमस्तावद् विकल्पे सति वस्तुनः।

जाग्रत्स्वापौ यथा स्वप्ने तथा विधिनिषेधता॥ ६१

syāt sādṛśyabhramastāvad vikalpe sati vastunaḥ|

jāgratsvāpau yathā svapne tathā vidhiniṣedhatā|| 61

अर्थ

जबतक अज्ञानके कारण एक ही परमतत्त्वमें अनेक वस्तुओंके भेद मालूम पड़ते रहते हैं, तबतक यह भ्रम भी रह सकता है कि जो वस्तुएँ पहले थीं, वे अब भी हैं और स्वप्नमें भी जिस प्रकार जाग्रत्, स्वप्न आदि अवस्थाओंके अलग-अलग अनुभव होते ही हैं तथा उनमें भी विधि-निषेधके शास्त्र रहते हैं—वैसे ही जबतक इन भिन्‍नताओंके अस्तित्वका मोह बना हुआ है, तबतक यहाँ भी विधि-निषेधके शास्त्र हैं ही॥ ६१॥✎ 1998

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1998 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): भोगरूपसे → भोग्यरूपसे

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