श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

विष्णुर्द्विजक्रियामूलो यज्ञो धर्ममयः पुमान्।

देवर्षिपितृभूतानां धर्मस्य च परायणम्॥ ११

viṣṇurdvijakriyāmūlo yajño dharmamayaḥ pumān|

devarṣipitṛbhūtānāṃ dharmasya ca parāyaṇam|| 11

अर्थ

विष्णुकी जड़ है द्विजातियोंका धर्म-कर्म; क्योंकि यज्ञ और धर्म ही उसके स्वरूप हैं। देवता, ऋषि, पितर, समस्त प्राणी और धर्मका वही परम आश्रय है॥ ११॥

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