इसलिये शरीर और आत्माका तत्त्व जाननेवाले पुरुष न तो अनित्य शरीरके लिये शोक करते हैं और न नित्य आत्माके लिये ही। परन्तु ज्ञानकी दृढ़ता न होनेके कारण जो लोग शोक करते रहते हैं, उनका स्वभाव बदलना बहुत कठिन है॥ ४९॥
अथ नित्यमनित्यं वा नेह शोचन्ति तद्विदः।
नान्यथा शक्यते कर्तुं स्वभावः शोचतामिति॥ ४९
इसलिये शरीर और आत्माका तत्त्व जाननेवाले पुरुष न तो अनित्य शरीरके लिये शोक करते हैं और न नित्य आत्माके लिये ही। परन्तु ज्ञानकी दृढ़ता न होनेके कारण जो लोग शोक करते रहते हैं, उनका स्वभाव बदलना बहुत कठिन है॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 817) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/2/49/