श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.50

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

लुब्धको विपिने कश्चित्पक्षिणां निर्मितोऽन्तकः।

वितत्य जालं विदधे तत्र तत्र प्रलोभयन्॥ ५०

lubdhako vipine kaścitpakṣiṇāṃ nirmito'ntakaḥ|

vitatya jālaṃ vidadhe tatra tatra pralobhayan|| 50

अर्थ

किसी जंगलमें एक बहेलिया रहता था। वह बहेलिया क्या था, विधाताने मानो उसे पक्षियोंके कालरूपमें ही रच रखा था। जहाँ-कहीं भी वह जाल फैला देता और ललचाकर चिड़ियोंको फँसा लेता॥ ५०॥✎ 2020

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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