उसने कहा—‘यों तो विधाता सब कुछ कर सकता है। परन्तु है वह बड़ा निर्दयी। यह मेरी सहचरी एक तो स्त्री है, दूसरे मुझ अभागेके लिये शोक करती हुई बड़ी दीनतासे छटपटा रही है। इसे लेकर वह करेगा क्या॥ ५३॥✎ 2020
अहो अकरुणो देवः स्त्रियाऽऽकरुणया विभुः।
कृपणं मानुशोचन्त्या दीनया किं करिष्यति॥ ५३
उसने कहा—‘यों तो विधाता सब कुछ कर सकता है। परन्तु है वह बड़ा निर्दयी। यह मेरी सहचरी एक तो स्त्री है, दूसरे मुझ अभागेके लिये शोक करती हुई बड़ी दीनतासे छटपटा रही है। इसे लेकर वह करेगा क्या॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 817) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/2/53/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)